भारत की दुष्ट बीड़ी समस्या - धूम्रपान-मुक्त दुनिया फाउंडेशन

भारत की दुष्ट बीड़ी समस्या

शोलापुर में कमरे का सर्वेक्षण करते समय मैं सबसे पहले तो महिलाओं की साड़ियों के लालित्य से, और फिर आईपैड से प्रभावित हुआ। चेहरा पहचानने वाले एडवांस्ड सॉफ़्टवेयर से लैस यह परिष्कृत मशीन, और बाकी के दृश्य में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है जो तेंदू पत्तियों के ढेर, प्रसंस्कृत तम्बाकू, धागों, और ख़तरनाक ढंग से पैनी कैंचियों से भरा हुआ है। मुझे बताया गया है कि पूरे दिन, हर महिला को इन घटकों का उपयोग करके हाथ से बनीं 1,000 सिगरेट बनानी होंगी जिन्हें बीड़ी कहा जाता है। यदि कोई महिला अपना कोटा पूरा करने में विफल रहती है, तो आईपैड में नोट हो जाएगा।

पूरे भारत के कस्बों और शहरों में यह दृश्य आम बात है। इस देश में दहनशील तम्बाकू का सबसे लोकप्रिय रूप बीड़ी है जिसका उपयोग 7.5 से 10 करोड़ लोग करते हैं और जो हर वर्ष 500 अरब बीड़ी फूंक देते हैं। इस रूप में, बीड़ी उद्योग एक विपुल, और थोड़ा गंदा, उद्योग है। सिगरेट की भांति इनसे भी स्वास्थ्य के लिए सभी प्रकार के ख़तरे जुड़े हुए हैं, जिनमें फेफड़ों का कैंसर, हृदयवाहिकीय रोग, और ट्यूबरकुलोसिस के जोख़िम में वृद्धि शामिल हैं। और बीड़ी बनाने वाली महिलाएं अपने अलग जोख़िमों का सामना करते हैं: परिवेशी तम्बाकू, कर्मियों की आंखों और फेफड़ों को क्षति पहुंचा सकता है—और साथ में दोहराव-युक्त शारीरिक श्रम के एक उपोत्पाद के रूप में दर्द और मुद्रा संबंधी समस्याएं तो हैं हीं।

पर फिर भी, इनमें से कई महिलाओं के लिए बीड़ी बनाना आजीविका कमाने का सर्वोत्तम और एकमात्र तरीका है। इस कार्य में मिलने वाली अत्यल्प मजदूरी रूपी करेले पर चढ़ा नीम यह है कि कई कर्मी महिलाएं यौन कार्य में भी संलिप्त होती हैं—एक और ख़तरनाक पेशा जो रोज़गार के विकल्पों के अभाव का संकेत देता है।

पिछले महीने शोलापुर के एक दौरे में मुझे बीड़ी बनाने वाली महिलाओं के एक समूह से बात करने का एक संक्षिप्त अवसर मिला। मैंने जाना कि उनमें से कई का दिन तम्बाकू से बीड़ियां बनाते और साथ-ही-साथ विभिन्न प्रकार के विषैला धूम्रमुक्त तम्बाकू उत्पाद चबाते बीतता है। उन्हें पता है कि इस आदत के साथ गंभीर रोगों का जोख़िम है, जिसमें विशेष रूप से मुंह का कैंसर शामिल है; पर निकोटीन एक प्रभावी उद्दीपक है और उनका कहना है कि इसी से वे पूरे दिन यह तुच्छ कार्य कर पाती हैं। इन महिलाओं का अनुभव उन जटिल तरीकों को रेखांकित करता है जिन तरीकों से तम्बाकू कई भारतीयों के—विशेष रूप से निर्धनता में जी रहे भारतीयों के जीवन में गुंथ गया है।

मेरी जिन महिलाओं से मुलाकात हुई उनसे मुझे तम्बाकू उत्पादन, विनिर्माण और उपयोग के गहरे उलझावों का दिखाई देने वाला साक्ष्य प्राप्त हुआ।

हालांकि मेरा दौरा सूचनाप्रद था, पर मैंने प्रश्नों के बहुतायत के साथ वहां से विदा ली, जिनमें से सबसे मौलिक प्रश्न यह था: हम बीड़ी उद्योग पर वर्तमान में निर्भर लोगों की आजीविकाएं नष्ट किए बिना भारत में बीड़ी का उपयोग कैसे घटा सकते हैं?

इस प्रश्न पर सोच-विचार करते समय, हमारे सामने दो सच आ खड़े होते हैं: (1) बीड़ी का उपयोग भारत में बड़ी संख्या में मौतों और रोगों के लिए ज़िम्मेदार है; और (2) कई समुदायों के लोग अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए बीड़ी बनाने के कार्य पर निर्भर हैं। इन दोनों तथ्यों के संगम से एक दुष्ट समस्या जन्म लेती है: “एक ऐसी सामाजिक या सांस्कृतिक समस्या जिसे चार कारणों से हल करना कठिन या असंभव है: अधूरा या विरोधाभासी ज्ञान, शामिल लोगों और मतों की संख्या, विशाल आर्थिक बोझ, और अन्य समस्याओं के साथ इन समस्याओं की आपस में जुड़े होने की प्रकृति।”

भारत की दुष्ट बीड़ी समस्या का कोई स्पष्ट समाधान नहीं है। पर हां, हम इसके अनगिनत घटकों को बेहतर ढंग से समझने के लिए कुछ कदम अवश्य उठा सकते हैं। सच में, हमें तब तक साधारण उपाय सुझाने के लोभ से बचना होगा जब तक हम बीड़ी के उत्पादन और उपभोग की, और समग्र रूप से भारत के तम्बाकू परितंत्र की एक समृद्ध और साक्ष्याधारित समझ विकसित नहीं कर लेते हैं।

प्रायः “तम्बाकू समस्या” को “सिगरेट समस्या” समझ लिया जाता है। फिर भी, यदि भारत की सारी-की-सारी सिगरेट अचानक ग़ायब हो जाएं, तो भी इस देश की भीमकाय तम्बाकू समस्या का बाल भी बांका न होगा। असल सिगरेट देश के तम्बाकू उपभोग का मात्र 10 प्रतिशत हैं; बीड़ी का, और विशेष रूप से धूम्रहीन तम्बाकू का उपयोग कहीं अधिक प्रचलित है। पर फिर भी, विस्मयकारी ढंग से देश की तम्बाकू नीतियों का मुख्य निशाना सिगरेट ही है।

उदाहरण के लिए, सरकार सिगरेट पर कर नियमित रूप से बढ़ाती है, जो केवल इतना सुनिश्चित करता है कि निर्धन लोग बीड़ी पीते रहें। यहां यह स्पष्ट है कि सब धान सत्ताइस सेर वाला दृष्टिकोण तम्बाकू नियंत्रण के मामले में असफल है। बल्कि, शोलापुर में होने के दौरान मेरा सामना इस कठोर वास्तविकता से हुआ कि हमारी कई वर्तमान तम्बाकू रणनीतियां अक्षम हैं। उदाहरण के लिए, डब्ल्यूएचओ तम्बाकू नियंत्रण पर फ्रेमवर्क सम्मेलन इस बात पर पर्याप्त विचार नहीं करता है कि अनुशंसाओं को भारत की जटिलताओं और ऐसे अन्य देशों जहां की तम्बाकू की समस्याएं भी इतनी ही दुष्ट हैं, की जटिलताओं के प्रति कैसे ढाला जाए।

भारत में और बाकी जगह अर्थपूर्ण बदलाव लागू करने के लिए, हमें ऊपर-से-नीचे उद्घोषणाएं करके नहीं बल्कि सुनकर आरंभ करना होगा। हमें क्षेत्र से आ रहे आंकड़ों को सुनना होगा, और तम्बाकू से सर्वाधिक प्रभावित लोगों की आवाज़ों को सुनना होगा।

हिंदी में प्रकाशित

वर्डप्रेस ऐप्लायंस - संचालक टर्नकी लिनक्स

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